कांग्रेस -छोटे राजनेतिक दलों के साथ धोखा करती है क्या यह चरित्र है कांग्रेस का – जानें यहाँ

Whether Chhotu Bhai Vasawa was betrayed by CM Gahlot or was not fit to fulfill the demand

of Chhotu Bhai –

जयपुर/डूंगरपुर (इकरा पत्रिका)। छोटू भाई वसावा समाजवादी पृष्ठभूमि के एक कद्दावर आदिवासी नेता हैं। जो भारतीय ट्राइबल पार्टी (बीटीपी) के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं। वे गुजरात की झागड़िया सीट से विधायक हैं और करीब आधा दर्जन बार से लगातार विधायक बनते आ रहे हैं। उनके पुत्र महेश भी गुजरात की डोडियापाड़ा विधानसभा सीट से विधायक हैं। छोटू भाई 2017 से पहले जनता दल के नेता के तौर पर विधायक रहे हैं। 2017 के गुजरात विधानसभा चुनाव में उन्होंने बीटीपी का गठन किया और एक बार फिर फतह का झण्डा गाड़ दिया।

छोटू भाई वसावा का इतना ही परिचय नहीं है, और भी है। जिससे आप भलीभांति परिचित हैं। सिर्फ आपको याद दिलवाने की आवश्यकता है। याद करें 8 अगस्त 2017 का दिन। इस दिन गुजरात में राज्यसभा चुनाव थे। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अमहद पटेल हारते हारते चुनाव जीत गए थे। उनको चुनाव जीतवाने में जो एक वोट ऐतिहासिक सहायक बना था, वो वोट छोटू भाई वसावा का ही था। छोटू भाई वसावा तब जनता दल यूनाइटेड के विधायक थे और पार्टी के अध्यक्ष एवं बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के आदेश व आग्रह के बावजूद उन्होंने भाजपा उम्मीदवार को वोट नहीं दिया।

उनका वोट भाजपा उम्मीदवार को डलवाने के लिए भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह और दूसरे वरिष्ठ नेताओं ने भी एड़ी चोटी का जोर लगा लिया। लेकिन छोटू भाई न किसी लालच में आए और ना ही किसी दबाव में। उन्होंने दो टूक कह दिया कि मेरा वोट साम्प्रदायिक पार्टी भाजपा को कतई नहीं मिलेगा। नीतीश कुमार ने बगावत करने के कारण उन्हें पार्टी से निकाल दिया। उनका वोट अहमद पटेल को पड़ा, लेकिन मतगणना और चुनाव परिणाम को लेकर विवाद हो गया था। मामला केन्द्रीय चुनाव आयोग तक पहुंच गया था, हर टीवी चैनल पर यही मुद्दा छाया रहा। देर रात को चुनाव आयोग का आदेश आया और मतगणना शुरू हुई।

पूरे देश की नजर टीवी चैनलों पर टिकी हुई थी, भाजपा और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता चैनलों की बहस में अपने अपने पक्ष को सही बता रहे थे। यह पहली बार था जब राज्यसभा का चुनाव इतना चर्चित हुआ। देर रात को परिणाम आया और अहमद पटेल को विजयी घोषित किया गया। चुनाव आयोग की इस घोषणा से भाजपा खेमे में सन्नाटा पसरा गया, क्योंकि मामला गुजरात का था, जहाँ से प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह आते हैं। साथ ही अहमद पटेल का था, जो गुजराती मुसलमान तो हैं ही, कांग्रेस की तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष सोनिया गांधी के तब राजनीतिक सलाहकार भी थे। इस जीत से कांग्रेस सहित तमाम विपक्षी खेमों में खुशी की लहर थी, उन्होंने इस खुशी का प्रदर्शन इस तरह किया, जैसे पीएम मोदी को करारी मात दे दी हो।

अहमद पटेल की जीत और भाजपा की करारी हार तय करने वाले तथा सम्पूर्ण विपक्ष को खुशी का जश्न मनाने का मौका देने वाले नेता का नाम छोटू भाई वसावा है। लेकिन आज कांग्रेस ने छोटू भाई वसावा को एक भी लोकसभा की सीट नहीं देकर उस एहसान को भूला दिया है। यह मानना है बीटीपी से जुड़े हुए लोगों और समाजवादी, अम्बेडकरवादी व मार्क्सवादी सियासी जानकारों का। सियासी गलियारों में चर्चा है कि सीएम अशोक गहलोत ने छोटू भाई वसावा के साथ सरासर धोखा किया है। वो इसलिए कि 2017 में अशोक गहलोत गुजरात के प्रभारी महासचिव थे और छोटू भाई वसावा का वोट अहमद पटेल को दिलवाने में उनकी भी महत्वपूर्ण भूमिका रही थी।

छोटू भाई वसावा की पार्टी बीटीपी की दिसम्बर 2018 में हुए राजस्थान विधानसभा चुनाव में कांग्रेस से गठबंधन की चर्चा थी। लेकिन यह गठबंधन नहीं हो सका और बीटीपी ने अपने उम्मीदवार घोषित कर दिए। विधानसभा चुनाव में बीटीपी के दो उम्मीदवार विधायक बनने में सफल हुए। इस चुनाव में बीटीपी ने डूंगरपुर जिले की चारों सीटों पर मजबूत उपस्थिति दर्ज करवाई। उसने यहाँ की चौरासी और सागवाड़ा विधानसभा सीटों को पहली बार में फ़तह किया तथा आसपुर सीट पर वो मामूली वोटों से चुनाव हार गई। बीटीपी ने इन तीनों सीटों पर कांग्रेस को तीसरे नम्बर पर धकेल दिया। बीटीपी से लोकसभा चुनाव में भी गठबंधन करने की चर्चा सियासी गलियारों में चल रही थी। लेकिन वो चर्चा सिर्फ चर्चा ही रही और गत दिनों कांग्रेस ने अपने उम्मीदवार घोषित कर दिए।

खबर है कि छोटू भाई वसावा कांग्रेस से राजस्थान में चार सीटें मांग रहे थे, लेकिन वो दो पर भी राज़ी हो जाते। परन्तु कांग्रेस नेतृत्व ने उन्हें एक भी लोकसभा सीट देना उचित नहीं समझा तथा मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने पार्टी आलाकमान को समझाया कि क्षेत्रीय दलों से गठबंधन करने से आगे चलकर कांग्रेस कमजोर हो जाएगी एवं यह क्षेत्रीय दल मजबूत होकर अगले चुनाव में और अधिक सीट मांगेंगे। सियासी पण्डितों का यह भी मानना है कि कांग्रेस की एक आदत है कि वो गठबंधन और चुनावी चर्चा के नाम पर क्षेत्रीय दलों को अटकाए रखती है और एनवक्त पर उन्हें छोड़ कर उम्मीदवार घोषित कर देती है। यही उसने बीटीपी के साथ किया।

कांग्रेस ने उम्मीदवार घोषित करते ही छोटू भाई वसावा ने भी राजस्थान में अपने उम्मीदवार घोषित कर दिए। उन्होंने बांसवाड़ा डूंगरपुर लोकसभा सीट से कांतिलाल रोत और जोधपुर लोकसभा सीट से अमर सिंह कालुंदा को अपना प्रत्याशी बनाया है तथा उदयपुर, राजसमन्द व जालोर से उम्मीदवार दूसरी सूची में घोषित करने की घोषणा की है। उन्होंने खुद के लिए गुजरात की भरूच लोकसभा सीट से चुनाव लड़ने की भी घोषणा की है। सियासी गलियारों में चर्चा यह भी है कि छोटू भाई वसावा राजस्थान के अलावा गुजरात, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ आदि राज्यों में भी सीटें मांग रहे थे और यह संख्या बीस के करीब थी, जिसे कांग्रेस देने में असमर्थ थी।

कारण जो भी हो लेकिन उक्त घोषणा से कांग्रेस और बीटीपी के रास्ते अलग अलग हो गए हैं। जिसके बारे में सियासी जानकारों का कहना है कि छोटू भाई वसावा जैसे मजबूत और संकट मोचक साथी को छोड़कर कांग्रेस ने सही नहीं किया है। उनसे कैसे भी करके गठबंधन करना चाहिए था, ताकि एक तो वोटों के बंटवारे से भाजपा को फायदा नहीं हो और दूसरा कांग्रेस पर यह स्थाई ठप्पा न लगे कि वो क्षेत्रीय दलों को साथ लेकर चलने में ईमानदारी नहीं बरतती है |

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