सर्वोच्च न्यायालय को गुमराह कर ” भाजपा – मोदी सरकार ” भगवा राष्ट्र का निर्माण कर रही है – पवन देव

बहुजन समाज का पतन आखिर क्यों –

 

13 रोस्टर पद्धति/प्रणाली लागू  –

हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय/कोर्ट द्वारा सभी को भारतीय संविधान के अनुच्छेद द्वारा सामाजिक न्याय दिया गया है। जिसमें 200
रोस्टर पद्धति को हटाते हुए, 13 रोस्टर पद्धति को सही माना गया है। जिसके अनुसार विष्वविद्यालय को एक इकाई नहीं मानते हुये प्रत्येक विभाग को इकाई माना गया है तथा प्रत्येक वि-ुनवजयाय के विभाग को ही इकाई माना गया है। जिसके अनुसार प्रत्येक विभाग में रिक्त 1-ंउचय3 पदों पर सामान्य वर्ग (ळमदमतंस ब्ंजमहवतल) का अधिकार होगा, 4-ंउचय6 रिक्त पदों पर अन्य पिछडे वर्ग
(व्ठब्) का अधिकार होगा। 7 से 9 रिक्त पदों पर दलित वर्ग (ैब्) तथा 10 से अधिक पद रिक्त होंगे तो जनजातीय वर्ग (ैज्) का अधिकार होगा जो कि निम्नानुसार न्यायसंगत नहीं है।-ंउचय
 प्रत्येक वि-ुनवजयाय विभाग/ईकाई में सामान्यतः 7 पद स्वीकृत होते
है।
 सभी पद सामान्यतः कभी भी एक साथ-ंउचयसाथ रिक्त नहीं होते है।
 जब भी पद रिक्त हो 1 से 3 पद पर सामान्य वर्ग ही आयेगा।
 कुल 10 पद रिक्त होंगे तो ही सभी वर्गो को लाभ मिलेगा जो
कि ऐसा संभव नहीं है। सामान्यतः 5-ंउचय7 पद ही स्वीकृत होते है।
 इसमें सबसे अधिक हानि जनजातीय वर्ग को ही है। जब 10 पद स्वीकृत
ही नहीं है तो 10 पद रिक्त कैसे होंगे। जिस कारण इन्हें कभी
भी भर्ती नहीं किया जा सकता।
 भारतीय संविधान के अनुसार सामाजिक न्याय एवं समानता के अधिकार का
पूर्ण उल्लंघन हुआ है क्योंकि इस प्रावधान में कहीं पर भी
समान अधिकार प्राप्त नहीं हुआ है।
 संविधान ने यह कही भी नहीं कहा की सर्वप्रथम लाभ सामान्य
वर्ग को देना है। फिर भी उच्चत्त्म न्यायालय ने सर्वप्रथम
सामान्य वर्ग को सबसे पहले 1 से 3 पद देते हुए सर्वप्रथम लाभ दिया
है। जबकि पिछड़ो को जिनको सबसे अधिक जरूरत है सबसे अन्त में
देने के लिए कहा है जो कभी प्राप्त नहीं हो सकता।
समानता के अधिकार का उल्लंघनः-ंउचय

प्रथम 4 रिक्त पदों पर सभी वर्गो का एक एक रिक्त पद पर नियुक्ति
देने के बजाये 1 से 3 रिक्त पदों पर सिर्फ सामान्य वर्ग को लाभ
देना न्यायसंगत नहीं है। क्योंकि सामान्य वर्ग को पिछ़डा
माना ही नहीं है। साथ ही संविधान में सामान्य वर्ग को
सर्वप्रथम लाभ देने के लिए प्रावधान नहीं है।
सामाजिक न्याय अनुच्छेद का उल्लंघनः-ंउचय
सबसे कमजोर वर्गो को सर्वप्रथम लाभ देने के स्थान पर सबसे अन्त
में लाभ देना यदि रिक्त पद उपलब्ध है तो, यह निर्णय अन्यायपूर्ण
है।
पिछडे़ वर्गो के अभ्यर्थी जो कि इन पदों पर पूर्ण रूप से पात्र है
उन्हें निजी षिक्षण संस्थाये आरक्षण की वजह से दरकिनार करती है,
उच्चतम न्यायालय को निर्णय देने से पूर्व विचार करना चाहिए था।
विष्वविद्यालय को अगर ईकाई नहीं माना जाता है तो राज्यपाल
(कुलपति), उपकुलपति, रजिस्ट्रार, उपरजिस्ट्रार, अतिरिक्त रजिस्ट्रार,
डीन जैसे विभिन्न प्रषासनिक/गैर प्रषासनिक पदों को हटाया
जाना चाहिए और प्रत्येक वि-ुनवजयाय विभाग में इन पदों पर नियुक्ति
कि जानी चाहिए।
सर्वोच्च न्यायालय एवं इलाहाबाद हाई कोर्ट ने यह नहीं बताया
कि पुरानी 200 रोस्टर प्रणाली कैसे गलत। जिसमें सभी के साथ
न्याय हो रहा था।
विभिन्न विष्वविद्यालय में सालों से रिक्त पड़े आरक्षित वर्ग के
बैकलॉग पदों के बारे में कुछ भी स्प-िुनवजयटकरण नहीं दिया
गया है। जो कि न्यायसंगत नहीं।
देष की 94 करोड़ जनसंख्या (व्ठब्ए ैब्ए ैज्) पर 49 प्रतिषत आरक्षण है और
39 करोड़ जनसंख्या (सामान्य) की जनसंख्या पर 51 प्रतिषत आरक्षण आरक्षणहै जो
कि न्यायसंगत नहीं है।

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